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अर्जुनविषादयोग

अर्जुनविषादयोगः · Arjuna-viṣāda-yoga · 47 श्लोक

अपन युगक सभसँ पैघ धनुर्धर अर्जुन दू टा सेनाक बीचमे ठाढ़ भ’ क’ ठिठकि जाइत छथि। ई अध्याय ओहि क्षणक कथा अछि जखन भय, शोक आ भ्रम कर्मकेँ असंभव बना दैत अछि। जीवनमे लगभग हर व्यक्ति एहि क्षणसँ गुजरैत अछि, आ गीता ओकरे नाम दए क’ आरंभ होइत अछि।

ज्योतिष पढ़बाक मार्गदर्शिका
ग्रहशनिराहु
परंपरासँ एहि समय पढ़ल जाइत अछिशनिक गोचर (साढ़ेसाती)राहु महादशा

परंपरामे एकरा शनि आ राहुसँ जोड़ल जाइत अछि: साढ़ेसाती वा राहु महादशाक भारी, भयभीत करऽ बला समयमे, जखन कर्तव्य बोझ लागैत अछि, मन उलझैत अछि आ सभ किछु दाँव पर लागल बुझाइत अछि। एहि अध्यायकेँ पढ़ब ओहि अवस्थाकेँ ईमानदारीसँ चिन्हबाक तरीका अछि। ई चिंतनक अभ्यास अछि, भविष्यवाणी नहि।

संस्कृत पाठ एकटा एआई आवाजमे पढ़ल गेल अछि।
1.1

धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥

dhṛtarāṣṭra uvāca
dharmakṣetre kurukṣetre samavetā yuyutsavaḥ |
māmakāḥ pāṇḍavāścaiva kimakurvata sañjaya ||

भावार्थ · श्लोक 1

आन्हर राजा धृतराष्ट्र अपन मंत्री संजयसँ पुछैत छथि जे कुरुक्षेत्रक पवित्र भूमि पर युद्धक लेल एकत्र भेल हुनकर पुत्र आ पाण्डव की क’ रहल छथि। गीताक पहिले शब्द युद्धभूमिकेँ धर्मक्षेत्र कहैत अछि।

1.2

सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥

sañjaya uvāca
dṛṣṭvā tu pāṇḍavānīkaṃ vyūḍhaṃ duryodhanastadā |
ācāryamupasaṃgamya rājā vacanamabravīt ||

1.3

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥

paśyaitāṃ pāṇḍuputrāṇāmācārya mahatīṃ camūm |
vyūḍhāṃ drupadaputreṇa tava śiṣyeṇa dhīmatā ||

भावार्थ · श्लोक 2–3

दुर्योधन पाण्डवक व्यूह-रचनामे ठाढ़ सेनाकेँ देखि अपन गुरु द्रोणाचार्यक लग जाइत छथि। ओ द्रुपदक पुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा सजाओल विशाल सेना दिस संकेत करैत छथि, जे द्रोणेक पूर्व शिष्य छथि।

1.4

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥

atra śūrā maheṣvāsā bhīmārjunasamā yudhi |
yuyudhāno virāṭaśca drupadaśca mahārathaḥ ||

1.5

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः ॥

dhṛṣṭaketuścekitānaḥ kāśirājaśca vīryavān |
purujitkuntibhojaśca śaibyaśca narapuṃgavaḥ ||

1.6

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥

yudhāmanyuśca vikrānta uttamaujāśca vīryavān |
saubhadro draupadeyāśca sarva eva mahārathāḥ ||

भावार्थ · श्लोक 4–6

ओ पाण्डव पक्षक महारथी सभक गणना करैत छथि, जे युद्धमे भीम आ अर्जुनक समान छथि: युयुधान, विराट, द्रुपद, धृष्टकेतु, काशिराज, युधामन्यु, उत्तमौजा तथा सुभद्रा आ द्रौपदीक पुत्र सभ।

1.7

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥

asmākaṃ tu viśiṣṭā ye tānnibodha dvijottama |
nāyakā mama sainyasya saṃjñārthaṃ tānbravīmi te ||

1.8

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥

bhavānbhīṣmaśca karṇaśca kṛpaśca samitiñjayaḥ |
aśvatthāmā vikarṇaśca saumadattistathaiva ca ||

1.9

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥

anye ca bahavaḥ śūrā madarthe tyaktajīvitāḥ |
nānāśastrapraharaṇāḥ sarve yuddhaviśāradāḥ ||

भावार्थ · श्लोक 7–9

फेर ओ अपन पक्षक सेनानायक सभक नाम लैत छथि: द्रोण, भीष्म, कर्ण, कृप, अश्वत्थामा, विकर्ण आ आन सभ। ओ कहैत छथि जे अनेक शस्त्रमे निपुण बहुत रास वीर हुनका लेल प्राण दए लेल तैयार छथि।

1.10

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥

aparyāptaṃ tadasmākaṃ balaṃ bhīṣmābhirakṣitam |
paryāptaṃ tvidameteṣāṃ balaṃ bhīmābhirakṣitam ||

1.11

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥

ayaneṣu ca sarveṣu yathābhāgamavasthitāḥ |
bhīṣmamevābhirakṣantu bhavantaḥ sarva eva hi ||

भावार्थ · श्लोक 10–11

ओ भीष्म द्वारा रक्षित अपन सेनाकेँ ‘अपर्याप्त’ कहैत छथि, ई शब्द ‘असीम’ आ ‘अपूर्ण’ दुनू अर्थ द’ सकैत अछि, जाहिमे हुनकर नुकाएल चिंता झलकैत अछि; भीम द्वारा रक्षित पाण्डव सेनाकेँ ओ एकर विपरीत बतबैत छथि। ओ सभ सेनानायक सभसँ कहैत छथि जे अपन-अपन स्थान पर डटल रहथि आ सभसँ बढ़ि क’ भीष्मक रक्षा करथि।

1.12

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥

tasya sañjanayanharṣaṃ kuruvṛddhaḥ pitāmahaḥ |
siṃhanādaṃ vinadyoccaiḥ śaṅkhaṃ dadhmau pratāpavān ||

1.13

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥

tataḥ śaṅkhāśca bheryaśca paṇavānakagomukhāḥ |
sahasaivābhyahanyanta sa śabdastumulo’bhavat ||

भावार्थ · श्लोक 12–13

दुर्योधनकेँ प्रसन्न करबाक लेल वृद्ध पितामह भीष्म सिंह जकाँ गरजि क’ शंख बजबैत छथि। ओहि क्षण शंख, नगाड़ा, ढोल आ नरसिंघा एक संग बाजि उठैत अछि आ भयंकर कोलाहल मचि जाइत अछि।

1.14

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥

tataḥ śvetairhayairyukte mahati syandane sthitau |
mādhavaḥ pāṇḍavaścaiva divyau śaṅkhau pradadhmatuḥ ||

1.15

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥

pāñcajanyaṃ hṛṣīkeśo devadattaṃ dhanañjayaḥ |
pauṇḍraṃ dadhmau mahāśaṅkhaṃ bhīmakarmā vṛkodaraḥ ||

1.16

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥

anantavijayaṃ rājā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ |
nakulaḥ sahadevaśca sughoṣamaṇipuṣpakau ||

1.17

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥

kāśyaśca parameṣvāsaḥ śikhaṇḍī ca mahārathaḥ |
dhṛṣṭadyumno virāṭaśca sātyakiścāparājitaḥ ||

1.18

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥

drupado draupadeyāśca sarvaśaḥ pṛthivīpate |
saubhadraśca mahābāhuḥ śaṅkhāndadhmuḥ pṛthakpṛthak ||

1.19

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् ॥

sa ghoṣo dhārtarāṣṭrāṇāṃ hṛdayāni vyadārayat |
nabhaśca pṛthivīṃ caiva tumulo’bhyanunādayan ||

भावार्थ · श्लोक 14–19

उज्जर घोड़ासँ जोतल भव्य रथ पर बैसल कृष्ण आ अर्जुन अपन दिव्य शंख बजाक’ उत्तर दैत छथि। फेर प्रत्येक पाण्डव वीर अपन-अपन नामधारी शंख बजबैत छथि, जेना पांचजन्य, देवदत्त, पौंड्र आ अनंतविजय, आ ओकर ध्वनि धृतराष्ट्रक पुत्र सभक हृदय चीरि दैत अछि।

1.20

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ॥

atha vyavasthitāndṛṣṭvā dhārtarāṣṭrān kapidhvajaḥ |
pravṛtte śastrasampāte dhanurudyamya pāṇḍavaḥ |
hṛṣīkeśaṃ tadā vākyamidamāha mahīpate ||

1.21

अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥

arjuna uvāca
senayorubhayormadhye rathaṃ sthāpaya me’cyuta ||

भावार्थ · श्लोक 20–21

कौरव सभकेँ व्यूहमे ठाढ़ देखि आ शस्त्र चलबाक समय आएल जानि कपिध्वज अर्जुन धनुष उठाक’ कृष्णसँ कहैत छथि: अच्युत, हमर रथकेँ दुनू सेनाक बीचमे ठाढ़ करू।

1.22

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥

yāvadetānnirīkṣe’haṃ yoddhukāmānavasthitān |
kairmayā saha yoddhavyamasmin raṇasamudyame ||

1.23

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥

yotsyamānānavekṣe’haṃ ya ete’tra samāgatāḥ |
dhārtarāṣṭrasya durbuddheryuddhe priyacikīrṣavaḥ ||

भावार्थ · श्लोक 22–23

हम हुनका सभकेँ नीकसँ देखए चाहैत छी जे युद्धक इच्छासँ ठाढ़ छथि, आ जिनकासँ हमरा लड़ए पड़त, जे दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र-पुत्रक भला चाहबाक लेल एतए एकत्र भेल छथि।

1.24

सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥

sañjaya uvāca
evamukto hṛṣīkeśo guḍākeśena bhārata |
senayorubhayormadhye sthāpayitvā rathottamam ||

1.25

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥

bhīṣmadroṇapramukhataḥ sarveṣāṃ ca mahīkṣitām |
uvāca pārtha paśyaitānsamavetānkurūniti ||

भावार्थ · श्लोक 24–25

कृष्ण उत्तम रथकेँ दुनू सेनाक बीच, भीष्म, द्रोण आ सभ राजाक सोझाँ ल’ जाक’ ठाढ़ करैत छथि आ कहैत छथि: पार्थ, एतए एकत्र भेल एहि कौरव सभकेँ देखू।

1.26

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥

tatrāpaśyatsthitānpārthaḥ pitṝnatha pitāmahān |
ācāryānmātulānbhrātṝnputrānpautrānsakhīṃstathā ||

1.27

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥

śvaśurānsuhṛdaścaiva senayorubhayorapi |
tānsamīkṣya sa kaunteyaḥ sarvānbandhūnavasthitān ||

भावार्थ · श्लोक 26–27

अर्जुन दुनू कात ठाढ़ पिता सभ, पितामह सभ, आचार्य सभ, मामा सभ, भाइ सभ, पुत्र सभ, पौत्र सभ, मित्र सभ, ससुर सभ आ हितैषी सभकेँ देखैत छथि। जिनकासँ लड़ए आएल छथि, से हुनकर अपने परिवारक लोक छथि।

1.28

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥

kṛpayā parayāviṣṭo viṣīdannidamabravīt |
arjuna uvāca
dṛṣṭvemaṃ svajanaṃ kṛṣṇa yuyutsuṃ samupasthitam ||

1.29

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥

sīdanti mama gātrāṇi mukhaṃ ca pariśuṣyati |
vepathuśca śarīre me romaharṣaśca jāyate ||

भावार्थ · श्लोक 28–29

गहिर करुणा आ शोकसँ भरल अर्जुन बजैत छथि। अपन स्वजन सभकेँ युद्धक लेल तैयार देखि हुनकर अंग शिथिल भ’ रहल अछि, मुँह सुखा रहल अछि, देह काँपि रहल अछि आ रोइयाँ ठाढ़ भ’ रहल अछि।

1.30

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥

gāṇḍīvaṃ sraṃsate hastāttvakcaiva paridahyate |
na ca śaknomyavasthātuṃ bhramatīva ca me manaḥ ||

भावार्थ · श्लोक 30

गांडीव धनुष हाथसँ छूटि रहल अछि, चमड़ी जरि रहल अछि, ओ ठाढ़ नहि रहि पाबि रहल छथि आ मन घुमैत सन बुझाइत अछि। ई नैतिक संकट पर देहक सच्चा प्रतिक्रिया अछि।

1.31

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥

nimittāni ca paśyāmi viparītāni keśava |
na ca śreyo’nupaśyāmi hatvā svajanamāhave ||

1.32

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥

na kāṅkṣe vijayaṃ kṛṣṇa na ca rājyaṃ sukhāni ca |
kiṃ no rājyena govinda kiṃ bhogairjīvitena vā ||

भावार्थ · श्लोक 31–32

अर्जुन अशुभ लक्षण देखैत छथि आ स्वजन सभकेँ मारबामे कोनो कल्याण नहि पबैत छथि। ओ कहैत छथि जे हुनका ने विजय चाही, ने राज्य, ने सुख। गोविंद, एहन राज्य, भोग वा जीवनसँ की लाभ?

1.33

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥

yeṣāmarthe kāṅkṣitaṃ no rājyaṃ bhogāḥ sukhāni ca |
ta ime’vasthitā yuddhe prāṇāṃstyaktvā dhanāni ca ||

1.34

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥

ācāryāḥ pitaraḥ putrāstathaiva ca pitāmahāḥ |
mātulāḥ śvaśurāḥ pautrāḥ śyālāḥ sambandhinastathā ||

1.35

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥

etānna hantumicchāmi ghnato’pi madhusūdana |
api trailokyarājyasya hetoḥ kiṃ nu mahīkṛte ||

भावार्थ · श्लोक 33–35

जिनका लेल हम राज्य आ सुख चाहैत छी, सएह सभ प्राण आ धन त्यागि एतए ठाढ़ छथि: आचार्य, पिता, पुत्र, पितामह, मामा, ससुर आ संबंधी। मधुसूदन, ओ सभ हमरा मारियो देथि तैयो हम हुनका सभकेँ मारए नहि चाहैत छी, तीनू लोकक राज्यक लेलो नहि, तखन पृथ्वीक तँ गपे की।

1.36

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥

nihatya dhārtarāṣṭrānnaḥ kā prītiḥ syājjanārdana |
pāpamevāśrayedasmānhatvaitānātatāyinaḥ ||

1.37

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥

tasmānnārhā vayaṃ hantuṃ dhārtarāṣṭrānsvabāndhavān |
svajanaṃ hi kathaṃ hatvā sukhinaḥ syāma mādhava ||

भावार्थ · श्लोक 36–37

धृतराष्ट्रक पुत्र सभकेँ मारि हमरा सभकेँ की प्रसन्नता भेटत? ओ सभ आततायी छथि, तैयो हुनका सभकेँ मारलासँ पाप हमरे सभकेँ लागत। तेँ अपन बंधु सभकेँ मारब हमरा सभक लेल उचित नहि; माधव, स्वजन सभकेँ मारि हम सभ सुखी कोना हएब?

1.38

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥

yadyapyete na paśyanti lobhopahatacetasaḥ |
kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ mitradrohe ca pātakam ||

1.39

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥

kathaṃ na jñeyamasmābhiḥ pāpādasmānnivartitum |
kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ prapaśyadbhirjanārdana ||

भावार्थ · श्लोक 38–39

लोभसँ हुनकर बुद्धि झाँपल अछि, तेँ ओ सभ कुलक नाशक दोष आ मित्रसँ द्रोहक पाप नहि देखैत छथि। मुदा हम सभ तँ देखि सकैत छी, जनार्दन, तखन हम सभ एहि पापसँ पाछाँ किएक नहि हटी?

1.40

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥

kulakṣaye praṇaśyanti kuladharmāḥ sanātanāḥ |
dharme naṣṭe kulaṃ kṛtsnamadharmo’bhibhavatyuta ||

1.41

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥

adharmābhibhavātkṛṣṇa praduṣyanti kulastriyaḥ |
strīṣu duṣṭāsu vārṣṇeya jāyate varṇasaṅkaraḥ ||

भावार्थ · श्लोक 40–41

आब अर्जुन अपन समयक दृष्टिसँ बजैत छथि: कुलक नाश भेला पर ओकर सनातन परंपरा नष्ट भ’ जाइत अछि; धर्म नष्ट भेला पर पूरा कुलकेँ अधर्म घेरि लैत अछि आ सामाजिक ताना-बाना कर्तव्यक उलझनमे बिखरि जाइत अछि।

1.42

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥

saṅkaro narakāyaiva kulaghnānāṃ kulasya ca |
patanti pitaro hyeṣāṃ luptapiṇḍodakakriyāḥ ||

1.43

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥

doṣairetaiḥ kulaghnānāṃ varṇasaṅkarakārakaiḥ |
utsādyante jātidharmāḥ kuladharmāśca śāśvatāḥ ||

1.44

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥

utsannakuladharmāṇāṃ manuṣyāṇāṃ janārdana |
narake niyataṃ vāso bhavatītyanuśuśruma ||

भावार्थ · श्लोक 42–44

ओ डेराइत छथि जे ई भ्रम कुलक नाश करऽ बला आ स्वयं कुल, दुनूकेँ नीचाँ खसबैत अछि, आ पितर अपन तर्पण-पिंडदानसँ वंचित भ’ जाइत छथि। ओ कहैत छथि, हम सुनने छी जे जिनकर कुलधर्म नष्ट भ’ जाइत छन्हि, हुनका लम्बा समय धरि नरकमे रहए पड़ैत छन्हि।

1.45

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥

aho bata mahatpāpaṃ kartuṃ vyavasitā vayam |
yadrājyasukhalobhena hantuṃ svajanamudyatāḥ ||

1.46

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥

yadi māmapratīkāramaśastraṃ śastrapāṇayaḥ |
dhārtarāṣṭrā raṇe hanyustanme kṣemataraṃ bhavet ||

भावार्थ · श्लोक 45–46

हाय! कतेक आश्चर्यक बात अछि जे राज्य-सुखक लोभमे हम सभ स्वजन सभकेँ मारबाक महापाप करबाक लेल तैयार छी! जँ शस्त्रधारी कौरव हमरा निहत्था आ प्रतिरोध नहि करऽ बलाकेँ युद्धमे मारि देथि, तँ ओ हमरा लेल बेसी कल्याणकारी होएत।

1.47

सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥

sañjaya uvāca
evamuktvārjunaḥ saṅkhye rathopastha upāviśat |
visṛjya saśaraṃ cāpaṃ śokasaṃvignamānasaḥ ||

भावार्थ · श्लोक 47

संजय कहैत छथि: एतेक कहि अर्जुन धनुष-बाण फेंकि देलनि आ शोकसँ व्याकुल मनसँ रथक पाछाँक भागमे बैसि गेलाह। अध्याय 1 एतहि समाप्त होइत अछि; कृष्णक उपदेश अध्याय 2सँ आरंभ होइत अछि।

श्लोक परंपरागत संस्कृत पाठ अछि। व्याख्या मौलिक सारांश अछि, कोनो विशेष अनुवादकक शब्द नहि। ज्योतिष मार्गदर्शिका भक्ति आ चिंतनक अभ्यास अछि, भविष्यवाणी नहि आ ने पेशेवर सलाहक विकल्प।