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सांख्ययोग: आत्मा आ ज्ञान

साङ्ख्ययोगः · Sāṅkhya-yoga · 72 श्लोक

कृष्ण आरंभहि मे अर्जुनसँ कहैत छथि जे देहक लेल शोक करब वास्तविकताकेँ चुकि जायब अछि: आत्मा ने कहियो जन्म लैत अछि, ने मरैत अछि। फेर ओ फलक आसक्तिक बिना कर्मक गप करैत छथि आ स्थिरबुद्धि पुरुषक वर्णन करैत छथि, जे आदर्श आगाँ पूरा गीता मे खुलैत अछि।

ज्योतिष पढ़बाक मार्गदर्शिका
ग्रहसूर्यगुरु
परंपरासँ एहि समय पढ़ल जाइत अछिसूर्य महादशासूर्यक कमजोर गोचर

परंपरामे एकरा सूर्य आ गुरुसँ जोड़ल जाइत अछि: सूर्यक स्व, अधिकार आ भीतरी प्रकाशक विषय, आ गुरुक ज्ञान आ मार्गदर्शनक विषय। एकरा सूर्य महादशामे वा गोचरमे सूर्यक कमजोर भेला पर पढ़ल जाइत अछि, जाहिसँ आत्मविश्वास आ अपनाक विषयमे स्थिर बोध घुरि सकय। ई चिंतनक अभ्यास अछि, भविष्यवाणी नहि।

संस्कृत पाठ एकटा एआई आवाजमे पढ़ल गेल अछि।
2.1

सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥

sañjaya uvāca
taṃ tathā kṛpayāviṣṭamaśrupūrṇākulekṣaṇam |
viṣīdantamidaṃ vākyamuvāca madhusūdanaḥ ||

भावार्थ · श्लोक 1

संजय कहैत छथि: कृष्ण देखैत छथि जे अर्जुन करुणासँ भरल छथि, हुनकर आँखि नोरसँ भरल छन्हि आ मन शोकसँ विचलित अछि। तखन ओ बाजब आरंभ करैत छथि।

2.2

श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥

śrībhagavānuvāca
kutastvā kaśmalamidaṃ viṣame samupasthitam |
anāryajuṣṭamasvargyamakīrtikaramarjuna ||

2.3

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥

klaibyaṃ mā sma gamaḥ pārtha naitattvayyupapadyate |
kṣudraṃ hṛdayadaurbalyaṃ tyaktvottiṣṭha parantapa ||

भावार्थ · श्लोक 2–3

कृष्ण पुछैत छथि: एहन समयमे ई विषाद अहाँकेँ कतएसँ आबि गेल? अर्जुन, ई अहाँकेँ शोभा नहि दैत अछि, ने एहिसँ कीर्ति भेटैत अछि, ने स्वर्ग। दुर्बलताक आगाँ नहि झुकू; एहि तुच्छ हृदय-दुर्बलताकेँ त्यागि उठि ठाढ़ होउ।

2.4

अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥

arjuna uvāca
kathaṃ bhīṣmamahaṃ saṅkhye droṇaṃ ca madhusūdana |
iṣubhiḥ pratiyotsyāmi pūjārhāvarisūdana ||

2.5

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् ।
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव ।
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥

gurūnahatvā hi mahānubhāvān |
śreyo bhoktuṃ bhaikṣyamapīha loke |
hatvārthakāmāṃstu gurūnihaiva |
bhuñjīya bhogān rudhirapradigdhān ||

2.6

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो ।
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्- ।
तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥

na caitadvidmaḥ kataranno garīyo |
yadvā jayema yadi vā no jayeyuḥ |
yāneva hatvā na jijīviṣāmas- |
te’vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣṭrāḥ ||

भावार्थ · श्लोक 4–6

अर्जुन उत्तर दैत छथि: जे हमर पूजनीय छथि, ताहि भीष्म आ द्रोण पर हम बाणसँ कोना प्रहार करी? एहन महान गुरुजनकेँ मारबासँ तँ भीख माँगि क’ जीबए बेसी नीक अछि। हम इहो नहि जनैत छी जे हमरा सभक लेल जीतब नीक अछि वा हारब, जखन जिनका बिना जीबए नहि चाहब, सएह सोझाँ ठाढ़ छथि।

2.7

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः ।
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे ।
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥

kārpaṇyadoṣopahatasvabhāvaḥ |
pṛcchāmi tvāṃ dharmasammūḍhacetāḥ |
yacchreyaḥ syānniścitaṃ brūhi tanme |
śiṣyaste’haṃ śādhi māṃ tvāṃ prapannam ||

2.8

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् ।
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं ।
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥

na hi prapaśyāmi mamāpanudyād |
yacchokamucchoṣaṇamindriyāṇām |
avāpya bhūmāvasapatnamṛddhaṃ |
rājyaṃ surāṇāmapi cādhipatyam ||

भावार्थ · श्लोक 7–8

अर्जुन मानैत छथि जे करुणाक दुर्बलता हुनकर स्वभावकेँ दबा देने अछि आ कर्तव्यक विषयमे हुनकर मन भ्रमित अछि। ओ कृष्णसँ स्पष्ट कहबाक लेल कहैत छथि जे की श्रेष्ठ अछि, स्वयंकेँ हुनकर शिष्य घोषित करैत छथि आ कहैत छथि जे निष्कंटक राज्यो इंद्रियकेँ सुखा देबऽ बला एहि शोककेँ दूर नहि क’ सकैत अछि।

2.9

सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥

sañjaya uvāca
evamuktvā hṛṣīkeśaṃ guḍākeśaḥ parantapa |
na yotsya iti govindamuktvā tūṣṇīṃ babhūva ha ||

2.10

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥

tamuvāca hṛṣīkeśaḥ prahasanniva bhārata |
senayorubhayormadhye viṣīdantamidaṃ vacaḥ ||

भावार्थ · श्लोक 9–10

संजय बतबैत छथि जे अर्जुन कहलनि, “हम युद्ध नहि करब,” आ चुप भ’ गेलाह। तखन कृष्ण मुस्काइत दुनू सेनाक बीच शोकग्रस्त अर्जुनसँ कहलनि।

2.11

श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥

śrībhagavānuvāca
aśocyānanvaśocastvaṃ prajñāvādāṃśca bhāṣase |
gatāsūnagatāsūṃśca nānuśocanti paṇḍitāḥ ||

भावार्थ · श्लोक 11

कृष्ण उपदेश आरंभ करैत छथि: अहाँ हुनका सभक लेल शोक करैत छी जिनका लेल शोक नहि करबाक चाही, तैयो ज्ञानक गप करैत छी। ज्ञानी ने जीवितक लेल शोक करैत छथि, ने मृतकक लेल।

2.12

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥

na tvevāhaṃ jātu nāsaṃ na tvaṃ neme janādhipāḥ |
na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarve vayamataḥ param ||

2.13

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

dehino’sminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā |
tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati ||

भावार्थ · श्लोक 12–13

एहन कोनो समय नहि छल जखन हम, अहाँ वा ई राजा सभ नहि छलहुँ, आ ने आगाँ कहियो हम सभक अस्तित्व समाप्त होएत। जेना एहि शरीरमे आत्मा बाल्यावस्था, युवावस्था आ बुढ़ारीसँ गुजरैत अछि, तहिना ओ दोसर शरीर प्राप्त करैत अछि; धीर पुरुष एहिसँ मोहित नहि होइत छथि।

2.14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥

mātrāsparśāstu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ |
āgamāpāyino’nityāstāṃstitikṣasva bhārata ||

2.15

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥

yaṃ hi na vyathayantyete puruṣaṃ puruṣarṣabha |
samaduḥkhasukhaṃ dhīraṃ so’mṛtatvāya kalpate ||

भावार्थ · श्लोक 14–15

इंद्रिय आ विषयक संपर्क सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख दैत अछि। ओ अबैत-जाइत अछि, स्थायी नहि अछि, तेँ अर्जुन, ओकरा सहू। जिनका ई विचलित नहि करैत छन्हि आ जे सुख-दुःखमे सम रहैत छथि, ओ अमरत्वक योग्य बनैत छथि।

2.16

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥

nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ |
ubhayorapi dṛṣṭo’ntastvanayostattvadarśibhiḥ ||

भावार्थ · श्लोक 16

जे असत् अछि तकर अस्तित्व नहि होइत अछि, आ जे सत् अछि तकर कहियो अभाव नहि होइत अछि। तत्त्वदर्शी सभ एहि दुनूक अंतिम स्वरूपकेँ जानि लेने छथि।

2.17

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥

avināśi tu tadviddhi yena sarvamidaṃ tatam |
vināśamavyayasyāsya na kaścitkartumarhati ||

2.18

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥

antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ |
anāśino’prameyasya tasmādyudhyasva bhārata ||

भावार्थ · श्लोक 17–18

जानू जे जाहिसँ ई सभ व्याप्त अछि से अविनाशी अछि; जे अपरिवर्तनशील अछि तकर नाश केओ नहि क’ सकैत अछि। ई शरीर नाशवान अछि, मुदा शरीरमे रहऽ बला नित्य, अप्रमेय आ अविनाशी अछि। तेँ अर्जुन, अपन कर्तव्यकेँ स्वीकार करू आ युद्ध करू।

2.19

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥

ya enaṃ vetti hantāraṃ yaścainaṃ manyate hatam |
ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate ||

2.20

न जायते म्रियते वा कदाचिन् ।
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो ।
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

na jāyate mriyate vā kadācin |
nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ |
ajo nityaḥ śāśvato’yaṃ purāṇo |
na hanyate hanyamāne śarīre ||

भावार्थ · श्लोक 19–20

जे एहि आत्माकेँ मारऽ बला बुझैत अछि आ जे एकरा मरल मानैत अछि, ओ दुनू नहि जनैत अछि: ई ने मारैत अछि, ने मारल जाइत अछि। ई ने कहियो जन्म लैत अछि, ने मरैत अछि, ने ई भ’ क’ फेर नहि होबऽ बला अछि; अजन्मा, नित्य, शाश्वत आ पुरातन ई शरीरक नष्ट भेलो पर नष्ट नहि होइत अछि।

2.21

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥

vedāvināśinaṃ nityaṃ ya enamajamavyayam |
kathaṃ sa puruṣaḥ pārtha kaṃ ghātayati hanti kam ||

2.22

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय ।
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- ।
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

vāsāṃsi jīrṇāni yathā vihāya |
navāni gṛhṇāti naro’parāṇi |
tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇā- |
nyanyāni saṃyāti navāni dehī ||

भावार्थ · श्लोक 21–22

जे एहि आत्माकेँ अविनाशी, नित्य आ अजन्मा जनैत अछि, ओ केकरो कोना मारय वा मरबाबय? जेना मनुष्य पुरान वस्त्र त्यागि नव वस्त्र धारण करैत अछि, तहिना देही आत्मा पुरान शरीर सभकेँ छोड़ि नव शरीर धारण करैत अछि।

2.23

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥

nainaṃ chindanti śastrāṇi nainaṃ dahati pāvakaḥ |
na cainaṃ kledayantyāpo na śoṣayati mārutaḥ ||

2.24

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥

acchedyo’yamadāhyo’yamakledyo’śoṣya eva ca |
nityaḥ sarvagataḥ sthāṇuracalo’yaṃ sanātanaḥ ||

2.25

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥

avyakto’yamacintyo’yamavikāryo’yamucyate |
tasmādevaṃ viditvainaṃ nānuśocitumarhasi ||

भावार्थ · श्लोक 23–25

एकरा शस्त्र काटि नहि सकैत अछि, आगि जरा नहि सकैत अछि, पानि भिजा नहि सकैत अछि, हवा सुखा नहि सकैत अछि। ई नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल आ सनातन अछि, इंद्रियसँ परे, चिंतनसँ परे आ विकारसँ परे अछि। एकरा एहिना जानि अहाँकेँ शोक नहि करबाक चाही।

2.26

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥

atha cainaṃ nityajātaṃ nityaṃ vā manyase mṛtam |
tathāpi tvaṃ mahābāho naivaṃ śocitumarhasi ||

2.27

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥

jātasya hi dhruvo mṛtyurdhruvaṃ janma mṛtasya ca |
tasmādaparihārye’rthe na tvaṃ śocitumarhasi ||

भावार्थ · श्लोक 26–27

जँ अहाँ एकरा सदिखन जन्म लेबऽ बला आ सदिखन मरऽ बला मानी, तैयो अहाँकेँ शोक नहि करबाक चाही। जनमल लोकक मृत्यु निश्चित अछि आ मरलाक जन्म निश्चित अछि, तेँ जे अपरिहार्य अछि तकरा पर शोक नहि करू।

2.28

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥

avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata |
avyaktanidhanānyeva tatra kā paridevanā ||

2.29

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- ।
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति ।
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥

āścaryavatpaśyati kaścidena- |
māścaryavadvadati tathaiva cānyaḥ |
āścaryavaccainamanyaḥ śṛṇoti |
śrutvāpyenaṃ veda na caiva kaścit ||

2.30

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥

dehī nityamavadhyo’yaṃ dehe sarvasya bhārata |
tasmātsarvāṇi bhūtāni na tvaṃ śocitumarhasi ||

भावार्थ · श्लोक 28–30

प्राणी जन्मसँ पहिने अदृश्य अछि, बीचमे देखाइत अछि आ मृत्युक बाद फेर अदृश्य भ’ जाइत अछि; एहिमे शोक कोन? केओ एहि आत्माकेँ आश्चर्य जकाँ देखैत अछि, केओ आश्चर्य जकाँ कहैत अछि, केओ आश्चर्य जकाँ सुनैत अछि, आ केओ सुनियो क’ एकरा नहि जानि पबैत अछि। सभक शरीरमे रहऽ बला आत्मा अवध्य अछि, तेँ केकरो लेल शोक नहि करू।

2.31

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥

svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi |
dharmyāddhi yuddhācchreyo’nyatkṣatriyasya na vidyate ||

2.32

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥

yadṛcchayā copapannaṃ svargadvāramapāvṛtam |
sukhinaḥ kṣatriyāḥ pārtha labhante yuddhamīdṛśam ||

2.33

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥

atha cettvamimaṃ dharmyaṃ saṃgrāmaṃ na kariṣyasi |
tataḥ svadharmaṃ kīrtiṃ ca hitvā pāpamavāpsyasi ||

भावार्थ · श्लोक 31–33

अपन धर्मकेँ देखियो क’ अहाँकेँ विचलित नहि होबाक चाही, किएक तँ क्षत्रियक लेल धर्मयुक्त युद्धसँ बढ़ि क’ किछु नहि। भाग्यशाली छथि ओ क्षत्रिय जिनका बिना मँगने एहन अवसर भेटैत छन्हि, मानू स्वर्गक खुजल द्वार। जँ अहाँ एहि धर्मयुक्त युद्धकेँ नहि करब, तँ अपन धर्म आ कीर्ति छोड़ि पापक भागी बनब।

2.34

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥

akīrtiṃ cāpi bhūtāni kathayiṣyanti te’vyayām |
sambhāvitasya cākīrtirmaraṇādatiricyate ||

2.35

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥

bhayādraṇāduparataṃ maṃsyante tvāṃ mahārathāḥ |
yeṣāṃ ca tvaṃ bahumato bhūtvā yāsyasi lāghavam ||

2.36

अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥

avācyavādāṃśca bahūnvadiṣyanti tavāhitāḥ |
nindantastava sāmarthyaṃ tato duḥkhataraṃ nu kim ||

भावार्थ · श्लोक 34–36

लोक अहाँक चिरस्थायी अपकीर्तिक चर्चा करत, आ सम्मानित व्यक्तिक लेल अपकीर्ति मृत्युसँ बेसी खराब अछि। महारथी सभ बुझताह जे अहाँ भयसँ युद्ध छोड़ि भागलहुँ, आ जिनकर दृष्टिमे अहाँ सम्मानित रही, ओ अहाँकेँ तुच्छ मानताह। अहाँक शत्रु अहाँक सामर्थ्यक निंदा करैत बहुत रास नहि कहबा योग्य गप कहताह; एहिसँ बेसी दुःख आर की होएत?

2.37

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥

hato vā prāpsyasi svargaṃ jitvā vā bhokṣyase mahīm |
tasmāduttiṣṭha kaunteya yuddhāya kṛtaniścayaḥ ||

2.38

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥

sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau |
tato yuddhāya yujyasva naivaṃ pāpamavāpsyasi ||

भावार्थ · श्लोक 37–38

जँ मारल गेलहुँ तँ स्वर्ग पाएब, जँ जीतलहुँ तँ पृथ्वीक भोग करब; तेँ दृढ़ निश्चय क’ क’ उठू। सुख-दुःख, लाभ-हानि आ जय-पराजयकेँ समान बुझि युद्धमे लागू, एना केलासँ अहाँकेँ पाप नहि लागत।

2.39

एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥

eṣā te’bhihitā sāṅkhye buddhiryoge tvimāṃ śṛṇu |
buddhyā yukto yayā pārtha karmabandhaṃ prahāsyasi ||

2.40

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥

nehābhikramanāśo’sti pratyavāyo na vidyate |
svalpamapyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt ||

भावार्थ · श्लोक 39–40

आब धरि ई सांख्यक, अर्थात् आत्मज्ञानक गप कहल गेल। आब योगक बुद्धि सुनू, जाहिसँ अहाँ कर्मक बंधन त्यागि देब। एहि मार्गमे कएल गेल प्रयास व्यर्थ नहि जाइत अछि आ कोनो बाधा एकरा हराबैत नहि अछि; एहि धर्मक थोड़बो अभ्यास महान भयसँ बचबैत अछि।

2.41

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥

vyavasāyātmikā buddhirekeha kurunandana |
bahuśākhā hyanantāśca buddhayo’vyavasāyinām ||

2.42

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥

yāmimāṃ puṣpitāṃ vācaṃ pravadantyavipaścitaḥ |
vedavādaratāḥ pārtha nānyadastīti vādinaḥ ||

2.43

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥

kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām |
kriyāviśeṣabahulāṃ bhogaiśvaryagatiṃ prati ||

2.44

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥

bhogaiśvaryaprasaktānāṃ tayāpahṛtacetasām |
vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate ||

भावार्थ · श्लोक 41–44

निश्चयात्मक बुद्धि एके टा होइत अछि; अनिश्चयी लोकक बुद्धि अनंत शाखावाली होइत अछि। किछु लोक वेदक फूल सन सजल वाणी बजैत अछि, स्वर्ग आ पुनर्जन्मकेँ कर्मफल बतबैत अछि आ भोग-ऐश्वर्यकेँ लक्ष्य मानैत अछि। जे भोग आ ऐश्वर्यमे आसक्त अछि, तकरा मे स्थिर, निश्चयात्मक बुद्धि नहि बनैत अछि।

2.45

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥

traiguṇyaviṣayā vedā nistraiguṇyo bhavārjuna |
nirdvandvo nityasattvastho niryogakṣema ātmavān ||

2.46

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥

yāvānartha udapāne sarvataḥ samplutodake |
tāvānsarveṣu vedeṣu brāhmaṇasya vijānataḥ ||

भावार्थ · श्लोक 45–46

वेद तीनू गुणक विषयक वर्णन करैत अछि; अर्जुन, अहाँ एहि गुण सभसँ ऊपर उठू: द्वंद्वसँ मुक्त, सदिखन सत्त्वमे स्थित, योग-क्षेमक चिंतासँ रहित आ आत्मवान बनू। जेना चारू कात पानि भरि गेला पर छोट जलाशयक ओतबे प्रयोजन रहैत अछि, तहिना ज्ञानीक लेल सभ वेदक।

2.47

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

karmaṇyevādhikāraste mā phaleṣu kadācana |
mā karmaphalaheturbhūrmā te saṅgo’stvakarmaṇi ||

भावार्थ · श्लोक 47

अहाँक अधिकार मात्र कर्म पर अछि, ओकर फल पर कहियो नहि। कर्मफलकेँ अपन हेतु नहि बनाउ आ अकर्ममे सेहो आसक्त नहि होउ। ई गीताक सभसँ उद्धृत श्लोक सभमेसँ एक अछि: अपन श्रेष्ठ करू, मुदा परिणामकेँ ने कर्मक कारण बनऽ दिअ, ने अपन शांतिक स्वामी।

2.48

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya |
siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate ||

भावार्थ · श्लोक 48

योगमे स्थित भ’ क’, आसक्तिकेँ त्यागि, सफलता आ असफलतामे सम रहैत कर्म करू, अर्जुन। एहि समताकेँ योग कहल जाइत अछि।

2.49

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥

dūreṇa hyavaraṃ karma buddhiyogāddhanañjaya |
buddhau śaraṇamanviccha kṛpaṇāḥ phalahetavaḥ ||

2.50

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥

buddhiyukto jahātīha ubhe sukṛtaduṣkṛte |
tasmādyogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam ||

भावार्थ · श्लोक 49–50

सकाम कर्म बुद्धियोगसँ बहुत निम्न अछि, तेँ बुद्धिक शरण लिअ; फल चाहऽ बला दयनीय अछि। जिनकर बुद्धि स्थिर अछि, ओ एहि जीवनमे पुण्य आ पाप दुनूसँ मुक्त भ’ जाइत छथि। तेँ योगमे लागू: योग कर्ममे कुशलता अछि।

2.51

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥

karmajaṃ buddhiyuktā hi phalaṃ tyaktvā manīṣiṇaḥ |
janmabandhavinirmuktāḥ padaṃ gacchantyanāmayam ||

2.52

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥

yadā te mohakalilaṃ buddhirvyatitariṣyati |
tadā gantāsi nirvedaṃ śrotavyasya śrutasya ca ||

2.53

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥

śrutivipratipannā te yadā sthāsyati niścalā |
samādhāvacalā buddhistadā yogamavāpsyasi ||

भावार्थ · श्लोक 51–53

बुद्धियुक्त ज्ञानी कर्मसँ उत्पन्न फलक त्याग क’ क’ जन्मक बंधनसँ मुक्त भ’ दुःख-रहित अवस्था प्राप्त करैत छथि। जखन अहाँक बुद्धि मोहक दलदल पार क’ लेत, तखन अहाँ सुनल आ सुनबा योग्य सभक प्रति उदासीन भ’ जाएब। जखन अनेक मतसँ भ्रमित अहाँक बुद्धि समाधिमे आत्मामे अचल आ स्थिर भ’ जाएत, तखन अहाँ योग प्राप्त करब।

2.54

अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥

arjuna uvāca
sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava |
sthitadhīḥ kiṃ prabhāṣeta kimāsīta vrajeta kim ||

भावार्थ · श्लोक 54

अर्जुन पुछैत छथि: समाधिमे स्थित स्थिरबुद्धि पुरुषक पहचान की अछि? एहन पुरुष कोना बजैत छथि, कोना बैसैत छथि आ कोना चलैत छथि?

2.55

श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥

śrībhagavānuvāca
prajahāti yadā kāmānsarvānpārtha manogatān |
ātmanyevātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadocyate ||

2.56

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥

duḥkheṣvanudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ |
vītarāgabhayakrodhaḥ sthitadhīrmunirucyate ||

2.57

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

yaḥ sarvatrānabhisnehastattatprāpya śubhāśubham |
nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā ||

2.58

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

yadā saṃharate cāyaṃ kūrmo’ṅgānīva sarvaśaḥ |
indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā ||

भावार्थ · श्लोक 55–58

कृष्ण उत्तर दैत छथि: जखन मनुष्य मनक सभ कामनाकेँ त्यागि आत्मामे संतुष्ट रहैत अछि, तखन ओ स्थितप्रज्ञ कहबैत अछि। जिनकर मन दुःखमे विचलित नहि होइत छन्हि, सुखक लालसा नहि रखैत छथि आ जे राग, भय आ क्रोधसँ मुक्त छथि, ओ स्थिरबुद्धि मुनि छथि। जे कतहु आसक्त नहि अछि, शुभ पाबि प्रसन्न आ अशुभ पाबि खिन्न नहि होइत अछि, तकर प्रज्ञा स्थिर अछि। जेना कछुआ अपन अंग समेटि लैत अछि, तहिना जे इंद्रियकेँ विषयसँ हटा लैत अछि, तकर प्रज्ञा स्थिर अछि।

2.59

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥

viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ |
rasavarjaṃ raso’pyasya paraṃ dṛṣṭvā nivartate ||

2.60

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥

yatato hyapi kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ |
indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ ||

2.61

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

tāni sarvāṇi saṃyamya yukta āsīta matparaḥ |
vaśe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣṭhitā ||

भावार्थ · श्लोक 59–61

विषय संयमीसँ दूर भ’ जाइत अछि, मुदा ओकर रस रहि जाइत अछि; परमात्माकेँ देखि लेला पर ओ रसो चलि जाइत अछि। चंचल इंद्रिय प्रयत्नशील बुद्धिमान पुरुषक मनकेँ सेहो बलपूर्वक घिचि लऽ जाइत अछि। तेँ ओहि सभकेँ वशमे क’ क’ हमरामे चित्त लगाक’ स्थिर बैसू; जिनकर इंद्रिय वशमे छन्हि, तकर प्रज्ञा स्थिर अछि।

2.62

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥

dhyāyato viṣayānpuṃsaḥ saṅgasteṣūpajāyate |
saṅgātsañjāyate kāmaḥ kāmātkrodho’bhijāyate ||

2.63

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥

krodhādbhavati sammohaḥ sammohātsmṛtivibhramaḥ |
smṛtibhraṃśād buddhināśo buddhināśātpraṇaśyati ||

भावार्थ · श्लोक 62–63

पतनक क्रम ई अछि: विषयक चिंतन केलासँ ओहिमे आसक्ति होइत अछि, आसक्तिसँ कामना, कामनासँ क्रोध, क्रोधसँ मोह, मोहसँ स्मृतिक भ्रम, स्मृतिक भ्रमसँ बुद्धिक नाश, आ बुद्धिक नाशसँ मनुष्यक पतन भ’ जाइत अछि।

2.64

रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥

rāgadveṣavimuktaistu viṣayānindriyaiścaran |
ātmavaśyairvidheyātmā prasādamadhigacchati ||

2.65

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥

prasāde sarvaduḥkhānāṃ hānirasyopajāyate |
prasannacetaso hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhate ||

भावार्थ · श्लोक 64–65

मुदा आत्मसंयमी पुरुष राग-द्वेषसँ मुक्त इंद्रियसँ विषयमे विचरैत प्रसन्नता प्राप्त करैत छथि। ओहि प्रसन्नतामे हुनकर सभ दुःख समाप्त भ’ जाइत छन्हि, आ एहन प्रसन्नचित्त पुरुषक बुद्धि शीघ्र स्थिर भ’ जाइत अछि।

2.66

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥

nāsti buddhirayuktasya na cāyuktasya bhāvanā |
na cābhāvayataḥ śāntiraśāntasya kutaḥ sukham ||

2.67

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥

indriyāṇāṃ hi caratāṃ yanmano’nuvidhīyate |
tadasya harati prajñāṃ vāyurnāvamivāmbhasi ||

भावार्थ · श्लोक 66–67

जकर मन वशमे नहि अछि, तकरामे स्थिर बुद्धि आ ध्यान नहि होइत अछि; ध्यानक बिना शांति नहि, आ शांतिक बिना सुख कतए? जेना हवा पानिमे नावकेँ हरि लऽ जाइत अछि, तहिना विषयमे भटकैत इंद्रियक पाछाँ चलऽ बला मन प्रज्ञाकेँ हरि लैत अछि।

2.68

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

tasmādyasya mahābāho nigṛhītāni sarvaśaḥ |
indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā ||

2.69

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥

yā niśā sarvabhūtānāṃ tasyāṃ jāgarti saṃyamī |
yasyāṃ jāgrati bhūtāni sā niśā paśyato muneḥ ||

भावार्थ · श्लोक 68–69

तेँ, अर्जुन, जकर इंद्रिय विषयसँ पूरा तरहेँ रोकल अछि, तकर प्रज्ञा स्थिर अछि। जे सभ प्राणीक लेल राति अछि, ताहिमे संयमी जगैत अछि, आ जाहिमे सभ प्राणी जगैत अछि, से देखऽ बला मुनिक लेल राति अछि।

2.70

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं ।
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे ।
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥

āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṃ |
samudramāpaḥ praviśanti yadvat |
tadvatkāmā yaṃ praviśanti sarve |
sa śāntimāpnoti na kāmakāmī ||

2.71

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥

vihāya kāmānyaḥ sarvānpumāṃścarati niḥspṛhaḥ |
nirmamo nirahaṅkāraḥ sa śāntimadhigacchati ||

भावार्थ · श्लोक 70–71

जेना नदी सभ सदिखन भरल आ स्थिर समुद्रमे समा जाइत अछि, तहिना सभ कामना जाहिमे समा जाइत अछि आ ओकरा विचलित नहि करैत अछि, ओ शांति पबैत अछि, कामनाक पाछाँ दौड़ऽ बला नहि। जे सभ कामनाकेँ त्यागि लालसा-रहित, ममता आ अहंकारसँ मुक्त भ’ विचरैत अछि, ओ शांति प्राप्त करैत अछि।

2.72

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥

eṣā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṃ prāpya vimuhyati |
sthitvāsyāmantakāle’pi brahmanirvāṇamṛcchati ||

भावार्थ · श्लोक 72

ई ब्राह्मी स्थिति अछि, अर्जुन। एकरा पाबि मनुष्य फेर मोहित नहि होइत अछि, आ अंत समयमे सेहो एहिमे स्थित रहि ओ ब्रह्मनिर्वाण, एकत्वक शांति प्राप्त करैत अछि।

श्लोक परंपरागत संस्कृत पाठ अछि। व्याख्या मौलिक सारांश अछि, कोनो विशेष अनुवादकक शब्द नहि। ज्योतिष मार्गदर्शिका भक्ति आ चिंतनक अभ्यास अछि, भविष्यवाणी नहि आ ने पेशेवर सलाहक विकल्प।