← सभ अध्याय · अध्याय 15 / 18
पुरुषोत्तमयोग
पुरुषोत्तमयोगः · Puruṣottama-yoga · 20 श्लोक
कृष्ण एक चित्रसँ आरंभ करैत छथि: पीपर सन उनटा गाछ, जकर जड़ि ऊपर आ डारि नीचाँ अछि, आ जकर पात वेद अछि। ई होएबाक आ बनबाक संसार अछि, जे परमात्मामे जड़ि रखैत अछि आ कामना आ कर्ममे पसरैत अछि। ओ एकरा क्रोधसँ नहि, वैराग्यक कुड़हरिसँ काटबाक आ फेर एकर पार देखबाक सलाह दैत छथि। अध्याय पुरुषोत्तमक नामकरण पर समाप्त होइत अछि, जे क्षर आ अक्षर दुनूसँ परे छथि।
परंपरामे एकरा बुधसँ जोड़ल जाइत अछि, जे बुद्धि आ विवेकक ग्रह अछि, आ गुरुसँ, जे ज्ञानक ग्रह अछि। एकरा तखन पढ़ल जाइत अछि जखन बुध कमजोर हो, बुधक महादशा चलैत हो, वा मन बेसी सोचबामे उलझि ई नहि चिन्हि पाबय जे की महत्त्वपूर्ण अछि। अध्याय विवेक सिखबैत अछि: पूरा गाछ देखू, फेर डारि पर अपन पकड़ ढील करू। ई चिंतनक अभ्यास अछि, भविष्यवाणी नहि।
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥
śrībhagavānuvāca
ūrdhvamūlamadhaḥśākhamaśvatthaṃ prāhuravyayam |
chandāṃsi yasya parṇāni yastaṃ veda sa vedavit ||
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा ।
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि ।
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥
adhaścordhvaṃ prasṛtāstasya śākhā |
guṇapravṛddhā viṣayapravālāḥ |
adhaśca mūlānyanusantatāni |
karmānubandhīni manuṣyaloke ||
कृष्ण कहैत छथि: ऊपर दिस जड़ि बला आ नीचाँ दिस डारि बला अविनाशी पीपरक गाछक गप कहल जाइत अछि, जकर पात वैदिक छंद अछि; जे एहि गाछकेँ जनैत अछि, से वेदक ज्ञाता अछि। एकर डारि गुण सभसँ पोषित भ’ नीचाँ आ ऊपर पसरल अछि, आ विषय एकर कोंपल अछि। नीचाँ दिस पसरल एकर जड़ि मनुष्य-लोकमे जीवकेँ कर्मसँ बान्हैत अछि।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते ।
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलं ।
असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥
na rūpamasyeha tathopalabhyate |
nānto na cādirna ca sampratiṣṭhā |
aśvatthamenaṃ suvirūḍhamūlaṃ |
asaṅgaśastreṇa dṛḍhena chittvā ||
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं ।
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये ।
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥
tataḥ padaṃ tatparimārgitavyaṃ |
yasmingatā na nivartanti bhūyaḥ |
tameva cādyaṃ puruṣaṃ prapadye |
yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī ||
एकर ओहन रूप एतए उपलब्ध नहि होइत अछि: ने एकर अंत, ने आदि आ ने स्थिति। एहि दृढ़ जड़ि बला गाछकेँ दृढ़ वैराग्य रूपी शस्त्रसँ काटि, फेर ओ पद ताकबाक चाही जकरा पाबि मनुष्य घुरि क’ नहि अबैत अछि, इएह सोचैत जे जिनकासँ ई पुरातन प्रवृत्ति पसरल अछि, तकरे आदि पुरुषक हम शरण लैत छी।
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा ।
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्- ।
गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥
nirmānamohā jitasaṅgadoṣā |
adhyātmanityā vinivṛttakāmāḥ |
dvandvairvimuktāḥ sukhaduḥkhasaṃjñair- |
gacchantyamūḍhāḥ padamavyayaṃ tat ||
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
na tadbhāsayate sūryo na śaśāṅko na pāvakaḥ |
yadgatvā na nivartante taddhāma paramaṃ mama ||
जे मान आ मोहसँ रहित अछि, जे आसक्ति रूपी दोषकेँ जीति लेने अछि, जे सदिखन आत्मामे स्थित अछि, जकर कामना शांत भ’ गेल अछि आ जे सुख-दुःखक द्वंद्वसँ मुक्त अछि, एहन मोह-रहित लोक ओहि अविनाशी पदकेँ प्राप्त करैत अछि। ओकरा ने सूर्य प्रकाशित करैत अछि, ने चंद्रमा, ने अग्नि; जकरा पाबि लोक नहि घुरैत अछि, सएह हमर परम धाम अछि।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
mamaivāṃśo jīvaloke jīvabhūtaḥ sanātanaḥ |
manaḥṣaṣṭhānīndriyāṇi prakṛtisthāni karṣati ||
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥
śarīraṃ yadavāpnoti yaccāpyutkrāmatīśvaraḥ |
gṛhītvaitāni saṃyāti vāyurgandhānivāśayāt ||
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥
śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ ca rasanaṃ ghrāṇameva ca |
adhiṣṭhāya manaścāyaṃ viṣayānupasevate ||
एहि जीव-लोकमे हमर सनातन अंश जीव भ’ क’ प्रकृतिमे स्थित मन आ पाँचो इंद्रियकेँ अपना दिस घिचैत अछि। जखन जीवात्मा शरीर प्राप्त करैत अछि आ जखन ओहिसँ निकलैत अछि, तखन एकरा सभकेँ संग ल’ जाइत अछि, जेना वायु गंधकेँ ओकर स्थानसँ ल’ जाइत अछि। कान, आँखि, त्वचा, जीह, नाक आ मनक आश्रय लक’ ओ विषयक सेवन करैत अछि।
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥
utkrāmantaṃ sthitaṃ vāpi bhuñjānaṃ vā guṇānvitam |
vimūḍhā nānupaśyanti paśyanti jñānacakṣuṣaḥ ||
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥
yatanto yoginaścainaṃ paśyantyātmanyavasthitam |
yatanto’pyakṛtātmāno nainaṃ paśyantyacetasaḥ ||
शरीर छोड़ि जाइत, रहैत वा विषयकेँ भोगैत, गुणसँ युक्त ओहि जीवात्माकेँ मूढ़ लोक नहि देखैत अछि; जिनकर आँखि ज्ञानक अछि, से देखैत अछि। प्रयत्न करऽ बला योगी सेहो ओकरा अपन भीतर स्थित देखैत अछि; मुदा जे अपन अंतःकरणकेँ शुद्ध नहि कएने अछि, से अविवेकी प्रयत्न करितो ओकरा नहि देखैत अछि।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
yadādityagataṃ tejo jagadbhāsayate’khilam |
yaccandramasi yaccāgnau tattejo viddhi māmakam ||
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥
gāmāviśya ca bhūtāni dhārayāmyahamojasā |
puṣṇāmi cauṣadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ ||
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥
ahaṃ vaiśvānaro bhūtvā prāṇināṃ dehamāśritaḥ |
prāṇāpānasamāyuktaḥ pacāmyannaṃ caturvidham ||
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो ।
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनञ्च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो ।
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥
sarvasya cāhaṃ hṛdi sanniviṣṭo |
mattaḥ smṛtirjñānamapohanañca |
vedaiśca sarvairahameva vedyo |
vedāntakṛdvedavideva cāham ||
सूर्यमे स्थित जे तेज समस्त जगतकेँ प्रकाशित करैत अछि, आ जे तेज चंद्रमा तथा अग्निमे अछि, तकरा अहाँ हमरहि तेज जानू। हम पृथ्वीमे प्रवेश क’ क’ अपन शक्तिसँ सभ प्राणीकेँ धारण करैत छी, आ रसमय चंद्रमा भ’ क’ सभ औषधिकेँ पुष्ट करैत छी। हम प्राणीक शरीरमे स्थित जठराग्नि भ’ क’ प्राण आ अपानसँ युक्त चारि प्रकारक अन्नकेँ पचबैत छी। हम सभक हृदयमे स्थित छी; हमरहिसँ स्मृति, ज्ञान आ ओकर लोप होइत अछि। सभ वेदसँ जानऽ योग्य हम छी; वेदांतक कर्ता आ वेदक जानऽ बला सेहो हम छी।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
dvāvimau puruṣau loke kṣaraścākṣara eva ca |
kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭastho’kṣara ucyate ||
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युधाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
uttamaḥ puruṣastvanyaḥ paramātmetyudhāhṛtaḥ |
yo lokatrayamāviśya bibhartyavyaya īśvaraḥ ||
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥
yasmātkṣaramatīto’hamakṣarādapi cottamaḥ |
ato’smi loke vede ca prathitaḥ puruṣottamaḥ ||
एहि लोकमे दू पुरुष अछि: क्षर आ अक्षर। सभ भूत क्षर अछि आ कूटस्थ अक्षर कहल जाइत अछि। मुदा उत्तम पुरुष एहि दुनूसँ भिन्न अछि, जकरा परमात्मा कहल गेल अछि; ओ अविनाशी ईश्वर तीनू लोकमे प्रवेश क’ क’ हुनकर भरण-पोषण करैत अछि। किएक तँ हम क्षरसँ अतीत छी आ अक्षरसँ सेहो उत्तम छी, तेँ लोकमे आ वेदमे पुरुषोत्तम नामसँ प्रसिद्ध छी।
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
yo māmevamasammūḍho jānāti puruṣottamam |
sa sarvavidbhajati māṃ sarvabhāvena bhārata ||
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥
iti guhyatamaṃ śāstramidamuktaṃ mayānagha |
etadbuddhvā buddhimānsyātkṛtakṛtyaśca bhārata ||
हे भारत, जे मोह-रहित भ’ हमरा एहि तरहेँ पुरुषोत्तम जनैत अछि, से सर्वज्ञ भ’ सभ भावसँ हमर उपासना करैत अछि। हे निष्पाप अर्जुन, ई अत्यंत गोपनीय शास्त्र हम अहाँकेँ आब कहलहुँ; एकरा जानि मनुष्य बुद्धिमान आ कृतकृत्य भ’ जाइत अछि।
श्लोक परंपरागत संस्कृत पाठ अछि। व्याख्या मौलिक सारांश अछि, कोनो विशेष अनुवादकक शब्द नहि। ज्योतिष मार्गदर्शिका भक्ति आ चिंतनक अभ्यास अछि, भविष्यवाणी नहि आ ने पेशेवर सलाहक विकल्प।