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भक्तियोग
भक्तियोगः · Bhakti-yoga · 20 श्लोक
अर्जुन पुछैत छथि जे के श्रेष्ठ अछि: सगुण ईश्वरक प्रेममयी भक्ति करऽ बला, वा निराकार अविनाशीक उपासना करऽ बला। कृष्ण कहैत छथि दुनू हमरा धरि पहुँचैत अछि, मुदा देहधारी सभक लेल भक्तिक मार्ग सरल अछि। फेर ओ हर स्वभावक लेल सीढ़ी सन अभ्यास बतबैत छथि आ अपन प्रिय भक्तक चित्र खिचैत छथि: मिलनसार, द्वेष-रहित, संतुष्ट, स्थिर, निंदा-स्तुतिमे अविचल। ई गीताक सभसँ कोमल अध्याय अछि।
परंपरामे एकरा शुक्रसँ जोड़ल जाइत अछि, जे प्रेम, भक्ति आ सामंजस्यक ग्रह अछि, आ चंद्रमासँ, जे भावनाक ग्रह अछि। एकरा तखन पढ़ल जाइत अछि जखन गोचरमे शुक्र कठिन हो, शुक्रक दशा चलैत हो, वा हृदय कठोर, कड़ू वा कटल बुझाय। ई अध्याय कमजोर भेनाइ बिना कोमल होएबाक मार्ग देखबैत अछि। ई चिंतनक अभ्यास अछि, भविष्यवाणी नहि।
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥
arjuna uvāca
evaṃ satatayuktā ye bhaktāstvāṃ paryupāsate |
ye cāpyakṣaramavyaktaṃ teṣāṃ ke yogavittamāḥ ||
अर्जुन पुछैत छथि: जे भक्त सदिखन अहाँमे लागल एहि तरहेँ अहाँक उपासना करैत अछि, आ जे अविनाशी अव्यक्तक उपासना करैत अछि, हुनका सभमे योगकेँ नीकसँ जानऽ बला के अछि?
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेताः ते मे युक्ततमा मताः ॥
śrībhagavānuvāca
mayyāveśya mano ye māṃ nityayuktā upāsate |
śraddhayā parayopetāḥ te me yuktatamā matāḥ ||
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यञ्च कूटस्थमचलन्ध्रुवम् ॥
ye tvakṣaramanirdeśyamavyaktaṃ paryupāsate |
sarvatragamacintyañca kūṭasthamacalandhruvam ||
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥
sanniyamyendriyagrāmaṃ sarvatra samabuddhayaḥ |
te prāpnuvanti māmeva sarvabhūtahite ratāḥ ||
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
kleśo’dhikatarasteṣāmavyaktāsaktacetasām |
avyaktā hi gatirduḥkhaṃ dehavadbhiravāpyate ||
कृष्ण कहैत छथि: जे हमरामे मन लगाक’, सदिखन युक्त रहि, परम श्रद्धासँ हमर उपासना करैत अछि, से हमर मतमे सभसँ श्रेष्ठ योगी अछि। मुदा जे अविनाशी, अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिंत्य, कूटस्थ, अचल आ ध्रुवक उपासना करैत अछि, इंद्रियकेँ नीकसँ वशमे क’ क’, सभमे सम बुद्धि रखैत आ सभ प्राणीक हितमे लागल रहि, से सेहो हमरहि पबैत अछि। तैयो अव्यक्तमे आसक्त चित्त बलाकेँ क्लेश बेसी होइत अछि, किएक तँ देहधारीक लेल अव्यक्तक गति कठिनाइसँ प्राप्त होइत अछि।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥
ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi saṃnyasya matparaḥ |
ananyenaiva yogena māṃ dhyāyanta upāsate ||
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥
teṣāmahaṃ samuddhartā mṛtyusaṃsārasāgarāt |
bhavāmi nacirātpārtha mayyāveśitacetasām ||
मुदा जे सभ कर्म हमरामे अर्पित क’ क’, हमरा परम मानि, अनन्य योगसँ हमर ध्यान करैत हमर उपासना करैत अछि, हमरामे चित्त लगाबऽ बला ओहि सभकेँ, हे पार्थ, हम शीघ्र मृत्युरूप संसार-सागरसँ उबारि दैत छी।
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥
mayyeva mana ādhatsva mayi buddhiṃ niveśaya |
nivasiṣyasi mayyeva ata ūrdhvaṃ na saṃśayaḥ ||
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥
atha cittaṃ samādhātuṃ na śaknoṣi mayi sthiram |
abhyāsayogena tato māmicchāptuṃ dhanañjaya ||
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥
abhyāse’pyasamartho’si matkarmaparamo bhava |
madarthamapi karmāṇi kurvansiddhimavāpsyasi ||
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥
athaitadapyaśakto’si kartuṃ madyogamāśritaḥ |
sarvakarmaphalatyāgaṃ tataḥ kuru yatātmavān ||
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥
śreyo hi jñānamabhyāsājjñānāddhyānaṃ viśiṣyate |
dhyānātkarmaphalatyāgastyāgācchāntiranantaram ||
अपन मन हमरहिमे लगाउ आ बुद्धिकेँ हमरामे स्थिर करू; एकरा बाद अहाँ हमरहिमे रहब, एहिमे संदेह नहि। जँ अहाँ चित्तकेँ हमरामे स्थिर रूपेँ नहि टिका सकैत छी, तँ हे धनंजय, अभ्यास योगसँ हमरा पाबऽ चाही। जँ अभ्यासहुमे असमर्थ छी, तँ हमरा लेल कर्म करबामे लागि जाउ; हमरा निमित्त कर्म करितो अहाँ सिद्धि पाएब। जँ इहो नहि क’ सकी, तँ हमर योगक आश्रय लक’, मनकेँ वशमे क’ क’ सभ कर्मक फल त्यागि दिअ। अभ्याससँ ज्ञान श्रेष्ठ अछि, ज्ञानसँ ध्यान विशिष्ट अछि, ध्यानसँ कर्मफल-त्याग श्रेष्ठ अछि, आ त्यागक तुरंत बाद शांति भेटैत अछि।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca |
nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ||
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
santuṣṭaḥ satataṃ yogī yatātmā dṛḍhaniścayaḥ |
mayyarpitamanobuddhiryo madbhaktaḥ sa me priyaḥ ||
जे कोनो प्राणीसँ द्वेष नहि करैत अछि, सभक मित्र आ दयालु अछि, ममता आ अहंकारसँ रहित अछि, सुख-दुःखमे सम आ क्षमाशील अछि, जे सदिखन संतुष्ट अछि, संयमी अछि, दृढ़ निश्चय बला अछि, आ जे मन-बुद्धि हमरा अर्पित क’ देने अछि, ओ हमर भक्त हमरा प्रिय अछि।
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥
yasmānnodvijate loko lokānnodvijate ca yaḥ |
harṣāmarṣabhayodvegairmukto yaḥ sa ca me priyaḥ ||
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
anapekṣaḥ śucirdakṣa udāsīno gatavyathaḥ |
sarvārambhaparityāgī yo madbhaktaḥ sa me priyaḥ ||
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥
yo na hṛṣyati na dveṣṭi na śocati na kāṅkṣati |
śubhāśubhaparityāgī bhaktimānyaḥ sa me priyaḥ ||
जकरासँ संसार उद्विग्न नहि होइत अछि आ जे स्वयं संसारसँ उद्विग्न नहि होइत अछि, जे हर्ष, ईर्ष्या, भय आ उद्वेगसँ मुक्त अछि, से हमरा प्रिय अछि। जे आकांक्षा-रहित, शुद्ध, कुशल, निष्पक्ष आ चिंता-रहित अछि, आ जे स्वार्थसँ उत्पन्न सभ आरंभ त्यागि देने अछि, ओ हमर भक्त हमरा प्रिय अछि। जे ने हर्षित होइत अछि, ने द्वेष करैत अछि, ने शोक करैत अछि, ने कामना करैत अछि, जे शुभ आ अशुभ दुनू छोड़ि देने अछि आ भक्तिसँ भरल अछि, से हमरा प्रिय अछि।
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥
samaḥ śatrau ca mitre ca tathā mānāpamānayoḥ |
śītoṣṇasukhaduḥkheṣu samaḥ saṅgavivarjitaḥ ||
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥
tulyanindāstutirmaunī santuṣṭo yena kenacit |
aniketaḥ sthiramatirbhaktimānme priyo naraḥ ||
जे शत्रु आ मित्रमे आ मान आ अपमानमे सम अछि, जे सर्दी-गर्मी आ सुख-दुःखमे सम अछि, जे आसक्तिसँ रहित अछि, जे निंदा आ स्तुतिकेँ समान बुझैत अछि, जे मौन अछि, जे जे भेटय तकरा मे संतुष्ट अछि, जकर कोनो निश्चित निवास नहि अछि, जे स्थिर बुद्धि बला आ भक्तिसँ भरल अछि, से मनुष्य हमरा प्रिय अछि।
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥
ye tu dharmyāmṛtamidaṃ yathoktaṃ paryupāsate |
śraddadhānā matparamā bhaktāste’tīva me priyāḥ ||
जे श्रद्धावान, हमरा परम लक्ष्य मानऽ बला भक्त एहि ऊपर बतओल धर्ममय अमृतक आचरण करैत अछि, से हमरा अत्यंत प्रिय अछि।
श्लोक परंपरागत संस्कृत पाठ अछि। व्याख्या मौलिक सारांश अछि, कोनो विशेष अनुवादकक शब्द नहि। ज्योतिष मार्गदर्शिका भक्ति आ चिंतनक अभ्यास अछि, भविष्यवाणी नहि आ ने पेशेवर सलाहक विकल्प।